खेड़ापति बालाजी धाम: हर मनोकामना पूरी होती है यहां

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जयपुर। खेड़ापति बालाजी धाम…. जयपुर जिले की फागी तहसील के माधोराजपुरा कस्बे से करीब तीन किलोमीटर दक्षिण में खेड़ा गांव में स्थित स्वयंमेव उद्भुत बालाजी का यह मंदिर आज भक्तों की आस्था और श्रद्धा का एक बड़ा केंद्र बन चुका है। यहां मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही आत्मिक शांति की अनुभूति होने लगती है। कहा जाता है कि यहां आने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती है। रोजाना यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु बालाजी के दर्शनों के लिए दूर-दूर से आते हैं। इतना ही नहीं यहां अनेक पदयात्राएं भी आती हैं जिसमें शामिल पदयात्री श्रद्धा और उत्साह के साथ खेड़ापति का आशीर्वाद प्राप्त करने को लालायित नजर आते हैं। जहां कभी जंगल होता था वहां अब बालाजी का भव्य मंदिर दिखाई पड़ता है। कुछ सालों पहले तक मंदिर का छोटा सा परिसर अब विशाल एवं भव्य रूप धारण कर चुका है। साथ ही मंदिर के समीप ही भण्डारे और सवामणि जैसे आयोजनों के लिए विशाल धर्मशाला का निर्माण भी पूर्ण हो चुका है।

मंदिर के प्रधान पुजारी देवकी नंदन पारीक का कहना है कि जिस स्थान पर आज भव्य मंदिर है वहां सैकड़ों साल पहले जंगल थे। ग्वाले अपनी गायों को यहां चराते थे। उन्हीं में से एक सफेद गाय रोजाना करील वृक्ष के समीप जाकर खड़ी होती और उसके थनों में से दूध स्वतः निकलकर धरती में समा जाता। यह सिलसिला कई दिन तक चला। बाद में पता लगने पर गांव वालों ने जब इस स्थान की खुदाई की तो यहां बालाजी की मूर्ति नजर आई। ग्रामवासियों ने मूर्ति को करील वृक्ष के समीप स्थापित कर दिया।

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मंदिर के प्रधान पुजारी के कथन और मंदिर के इतिहास की प्रमाणिकता को साबित करने के लिए मंदिर परिसर में मौजूद करील वृक्ष अपने आप में बड़ा प्रमाण है। मंदिर के समीप ही हनुमान कुण्ड बना हुआ है। किंवदंतियों के अनुसार स्वयं बालाजी इस कुण्ड में स्नान किया करते थे। इस कुण्ड को लेकर मान्यता है कि इसके जल के स्पर्श मात्र से शारीरिक रोग ठीक हो जाते हैं। बालाजी धाम में हर साल वैशाख शुक्ल सप्तमी को बालाजी का पाटोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।


सात्विक उपासना का केंद्र बन चुके खेड़ाधाम के बारे में प्रधान पुजारी देवकी नंदन का कहना है कि सम्वत 1800 के करीब जयपुर रियासत के दीवान दौलतराम हल्दिया की मनोकामना पूर्ण होने पर बालाजी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर इस मंदिर के निर्माण का आदेश दिया। जिस पर दीवान हल्दिया ने यहां मंदिर और हनुमान कुण्ड का निर्माण करवा कर स्वयं उद्भुत बालाजी की मूर्ति को विधिवत तरीके से प्रतिष्ठापित कराया। यहां भक्त अपनी मन्नत पूरी होने के बाद सवामणि और भण्डारे का आयोजन कर बालाजी के प्रति अपनी श्रद्धा का इजहार करते हैं। यहां आने वाली पदयात्राओं के साथ आने वाली विशाल ध्वजा को बालाजी के चरणों में अर्पित करने के बाद मंदिर के शिखर पर स्थित गुंबद पर फहराने की परम्परा है। मंदिर के पट खुलने के साथ ही भक्तों के आने का सिलसिला शुरू हो जाता है, जो पट बंद होने के साथ ही थमता है। सैकड़ों भक्त रोजाना अपनी मनोकामना के साथ बालाजी के चरणों में ढोक लगाते हैं।

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