समानान्तर साहित्य उत्सव विचारों का एक बड़ा आंदोलन – विष्णु खरे

समानान्तर साहित्य उत्सव के शुभारंभ पर मुक्तिबोध मंच पर मौजूद साहित्य के नामचीन हस्ताक्षर OLYMPUS DIGITAL CAMERA

प्रलेस का तीन दिवसीय समानान्तर साहित्य उत्सव शुरू

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जयपुर। प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान में शनिवार को जयपुर के सवाई मानसिंह स्टेडियम के नजदीक यूथ हाॅस्टल में देश के सुप्रसिद्ध साहित्यकारों विष्णु खरे, नरेश सक्सेना, लीलाधर मंडलोई, विभूति नारायण राय, डाॅ. अर्जुनदेव चारण, राजेन्द्र राजन ने दीप प्रज्जवलित कर पहले समानान्तर साहित्य उत्सव का उद्घाटन किया। उत्सव का शुभांरभ फैज अहमद फैज की नज्म के गायन से हुआ जिसे अजन्ता देव ने प्रस्तुत किया।

समानान्तर साहित्य उत्सव के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते विष्णु खरे, मैत्रेयी पुष्पा, अर्जुनदेव चारण और नरेश सक्सेना

अपने उद्घाटन भाषण में सुप्रसिद्ध कवि विष्णु खरे ने समानान्तर साहित्य उत्सव को एक बड़ा आंदोलन बताते हुए कहा कि लिट-फेस्ट कल्चर को बढ़ावा देने वाले उत्सवों में न तो बड़े लेखक होते हैं और ना ही उनकी किताबें कहीं बिकती हैं। वे बडे़ और जन पक्ष हम में लिखने वाले लेखकों को नहीं बुलाते। ये साहित्य के नाम पर विदेशी प्रकाशकों का एक षड़यत्र है और हमारे प्रकाशक भी उनके पीछे हो गये हैं।
उन्होंने चिंता दर्शाई कि हमारी सभी भाषाएं मिटती जा रही हैं। इसके लिए ऐसे आयोजन बहुत महत्वपूर्ण है। ऐसे आयोजन के साथ लेखकों को भी मुखर होना पड़ेगा। राजनीति में भी हिस्सा लेना पडेगा। उन्हें अधिकाधिक ब्लाॅग लिखने होंगे।
प्रतिष्ठित कवि नरेश सक्सेना ने अपने संबोधन में समानान्तर साहित्य उत्सव को एक महत्वपूर्ण घटना बताते हुए कहा कि यह एक चिंगारी है जिसे निरन्तर प्रज्ज्वलित किये जाने की आवश्यकता है। साहित्य में वर्ष 2018 का यह साल एक बड़ी साहित्यिक घटना के रूप में दर्ज होने जा रहा है। ऐसे उत्सव लखनऊ में भी होंगे। उन्होंने लिट फेस्ट के नाम पर अंग्रेजी के वर्चस्व को बढ़ाने के प्रयासों की निंदा करते हुए कहा कि स्वाधीनता पूर्व हमारी भाषाएं आजाद थी जबकि इसके बाद के समय में वे गुलाम होती चली गई। किन्तु हिन्दी मारने से नहीं मरेगी क्योंकि यह 60 करोड़ लोगों की भाषा है। राजस्थानी और भोजपुरी का विकास भी होने दीजिए क्योंकि हिन्दी से इसका कोई विरोध नहीं है। हमारा अंग्रेजी भाषा से भी कोई विरोध नहीं है लेकिन ज्ञान की भाषा तो मातृ भाषा ही होगी।
नरेश सक्सेना ने कहा कि अंगे्रजी अन्तर्राष्ट्रीय भाषा नही है। यह हमारी भाषा नही है और इसका वर्चस्व नहीं हो सकता। बाजारवाद इसे बढावा दे रहा है ताकि हमारी युवा पीढ़ी मल्टीनेशनल कम्पनियों में खप सकें। अंग्रेजी हमारा विनाश कर रही है। जगदीश बोस, एस एन बोस, रामानुजम ने अंग्रेजी में नही बल्कि अपनी मातृभाषा में ज्ञान प्राप्त कर दुनिया में नाम कमाया। उन्होंने शिक्षा, चिकित्सा, स्वास्थ्य के बजट में सरकार हमारा 50 प्रतिशत कटौती करने का भी विरोध किया।
ज्ञानपीठ के निदेशक और नया ज्ञानोदय से संपादक लीलाधर मंडलोई ने कहा कि यह वह दौर है जिसमें हमें अपने पुरखों से मिली विरासत को छीना जा रहा है। आज जल, थल, वायु, अग्नि और आकाश पर भी हमारा हक नहीं रहा। इस पर कहीं धर्म, कहीं पंूजी, कहीं कारपोरेट्स, कहीं मल्टीनेशनल कम्पनियों का कब्जा है। हमें अपनी भाषा, संस्कृति और विरासत को बचाना होगा। हमें बकौल मुक्तिबोध यह अहसास करना होगा कि हम जिन्दा है, जिन्दा हैं, जिन्दा हैं। हमें अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे।

समानान्तर साहित्य उत्सव के पहले दिन अहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन के शामे गजल के साथ ही राजस्थानी नृत्य आदि का भव्य आयोजन हुआ

दिल्ली हिन्दी अकादमी की उपाध्यक्ष और सुपरिचित लेखिका मैत्रयी पुष्पा ने कहा कि सत्ता हमेशा रही है। सत्ता से वे लोग लड़ते रहे हैं जो कमजोर, हारे हुए या हराये हुए लोग हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि लिट्रेचर का भी कारोबार हो रहा है। लेखकों की भी श्रेणियां बना दी गई हैं। उन्होंने कहा कि ’बेस्ट सेलर’ की नहीं ’बेस्ट टेलर’ की जरूरत है जो सच बता सके, कह सके और उससे परिचित करा सके। दुर्भाग्य से लेखक आज अपना ही प्रचार कर रहे हैं। पहले लेखकों की किताबों पर समीक्षक बताते थे कि किताब कैसी है पाठकों के अध्ययन से अन्य पाठकों तक बात पहुंचती थी। आज लेखक का पाठक से विश्वास उठ गया है। उन्होंने कहा कि आम आदमी के पक्ष में और दबी-कुचली नारी के पक्ष में कलम चलाने की जरूरत है। लिट-फेस्ट कल्चर में अलग तरह के लेखकों का बुलाया जाता है। वहां लेखकीय शक्ति को नही मापा जाता । इस दृष्टि से समानान्तर साहित्य उत्सव बहुत अर्थवान है। हम दिल्ली में इस काम को आगे बढ़ायेंगे।
प्रगतिशील लेखक संघ के महसचिव राजेन्द्र राजन ने सत्ता और बाजार का गठजोड़ हमारा ध्यान मूल विषयों से हटाना चाहता है। कभी गाय, कभी भोजन, कभी फिल्म के नाम पर हमारा ध्यान रोटी, महंगाई के सवाल से हटाया जा रहा है। उन्माद की राजनीति, हिंसा और घृणा की राजनीति चल रही है जबकि हम कबीर के ढाई आखर प्रेम में विश्वास करते है। उन्होंने कहा कि लेखकों को राजनीति से जुड़ना होगा और लेखनी तथा भौतिक रूप से वर्तमान समय की चुनौतियों से मुकाबला करना होगा। यह आयोजन राजस्थान की उस ऐतिहासिक संास्कृतिक धरती पर हो रहा है जो स्त्री-विमर्श की आदि जननी मीरा की भूमि रही है।
एन.एस.डी. के चेयरमैन और प्रतिष्ठत राजस्थानी कवि डाॅ. अर्जुनदेव चारण ने कहा कि बाजारवाद ने लेखक और पाठक को अलग तरह से परिभाषित करने का प्रयास किया है। बाजार चेतना पर कब्जा करना चाहता है। यह उत्सव भारतीय भाषाओं के सम्मान और पहचान का उत्सव है। डाॅ. चारण ने कहा कि भाषा नहीं बचेगी तो संस्कृति नही बचेगी, पहचान नहीं बचेगी। उन्होंने राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए चलाए जा रहे संघर्ष में सभी के सहयोग की अपील की। इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार विभूतिनारायण राय ने भी विचार व्यक्त किये।
प्रारम्भ में समानान्तर साहित्य उत्सव के मुख्य समन्वयक ईशमधु तलवार ने बताया कि यह आयोजन भारतीय भाषओं के सम्मान का उत्सव है और साहित्य को बाजार बना देने की साजिश के खिलाफ एक सकारात्मक मुहिम है यह आयोजन एक ऐसे ऐतिहासिक संगठन प्रगतिशील लेखक संघ के झण्डे तले हो रहा है जिसकी स्थापना उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द ,सज्जाद जहीर और क्रांतिकारी लेखकों ने की थी। इस आयोजन का उद्देश्य लिट-फेस्ट के नाम पर अपसंस्कृति को बढ़ावा देने वाली शक्तियों को चेतावनी देना है। भारतीय भाषाओं को तरजीह देना और अंग्रेजी वर्चस्व का प्रतिरोध करना है।
फेस्टीवल चैयरमैन ऋतुराज ने अतिथियों का स्वागत् करते कहा कि सभी लिट-फेस्ट के नाम पर हमारी संस्कृति और भाषाओं का जिस प्रकार अपमान किया जा रहा है। उसके प्रतिरोध में समानान्तर सहित्य उत्सव एक छोटी सी पहल और झील में ठहरे पानी में पत्थर फैंकने की कोषिष भर है। यह अभिजात के वर्ग के लोगों के खिलाफ एक लड़ाई है जो यथास्थितिवाद बनाए रखने के साथ साहित्य एवं संस्कृति की झूठी परिभाषाएं रच रहे हैं। हमारा यह प्रयास है कि लोग सच्चे और अच्छे साहित्य से रूबरू हों यह उत्सव सत्ता और बाजार के समीकरणों को चुनौती देने की दिशा में एक वैकल्पिक हस्तक्षेप है। देश और प्रदेश के ख्यातनाम लेखकों की यहां इस साहित्य उत्सव में उपस्थिति उनकी बैचेनी और एकजुटता का प्रतीक है।
फेस्टीवल के संयोजक कृष्ण कल्पित ने उत्सव की रूपरेखा की जानकारी देते हुए बताया कि लिट-फेस्ट संस्कृति पूंजीवाद का घिनौना सांस्कृतिक चेहरा है। प्रलेस ने इस अपसंस्कृति के विरोध में इस उत्सव का आयोजन किया है। हम इस के जरिए संस्कृति का एक सही विकल्प प्रस्तुत करना चाहते है। कलाओं की दुनिया में समानान्तर आंदोलन होते रहे है। साहित्य और फिल्मों में भी ऐसे आंदोलन समय-समय पर हुए। हमने यह काम शून्य से शुरू किया है किन्तु इसमें साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों, मीडिया का उल्लेखनीय समर्थन मिला है। यह विचार आधारित आयोजन है।
समारोह स्थल पर अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कावा ब्रास बैण्ड ने समानान्तर साहित्य उत्सव के उद्घाटन से पूर्व राजस्थानी लोकगीतो पनिहारिन, घूमर और चिरमी की धुनों पर सुमधुर धुनों से दर्शकों, श्रोताओं और सभी आगन्तुकों का मन मोह लिया। इन धुनों पर लोग झूमते नजर आए।

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