ज्ञान को बिना बांटे कवि की मुक्ति संभव नहीं-नरेश सक्सेना

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जयपुर। समानान्तर साहित्य उत्सव के गोडावण मंच पर लेखक से मिलिए कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार नरेश सक्सेना ने प्रेमचंद गांधी से बातचीत के दौरान कहा कि फिल्म की एक अलग ही ग्रामर होती है, जिसे मैंने एक फिल्म निर्देशक के रूप में बखूबी समझते हुए राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीता था, लेकिन आजकल अच्छे लेखकों के लिए फिल्मकार की शर्तो पर संवाद या गाने लिखना बहुत मुश्किल भरा है। नरेश सक्सेना ने मुक्तिबोध की कविता ’ब्रह्मराक्षस’ की पंक्ति ’’मै और गहरा जाना चाहता हँू, न जाने क्या मिल जाये?’’ के माध्यम से संदेश दिया कि ज्ञान को वितरण करने पर ही कवि की मुक्ति संभव है। सक्सेना ने मुक्तिबोध की रचनाओं में ’क्वांटम फिजिक्स’ के कुछ अनछुए पहलुओं कों पहली बार साहित्य के मंच पर जोरदार तरीके से पेश भी किया।


गोडावण मंच पर ही एक अन्य सत्र में लेखक से मिलिए कार्यक्रम में कवयित्री प्रीता भार्गव ने स्त्री विमर्श पर चर्चा की। उनसे अनन्त भटनागर ने संवाद किया। प्रीति भार्गव ने कहा कि स्त्री को आत्मा के दीपक के आलोक में खुद को पहचानना होगा। उन्होंने पुरूष को शिशु स्वभाव एवमं स्त्री को मां के समान माना है। उन्होंने कहा मां चाहे तो बिगड़े बच्चे को शिक्षा दे सकती है और पुरूष को भी बदल सकती है।


कुरजां मंच पर तीसरे सत्र में लेखक से मिलिए कार्यक्रम में वरिष्ठ कथाकार नूर जहीर से युवा कथाकार तस्नीम खान ने संवाद किया। नूर जहीर ने मुस्लिम स्त्रियों के दर्द के पीछे समाज की अशिक्षा एवम् हीन विचार को माना है। नूर जहीर ने कहा कि जब तक हम अपने ही भीतर और अपने ही घर में स्त्रियों को खुल कर जीने की आजादी नहीं देगे तब तक समाज में बदलाव नहीं आ सकता। इसके लिए तो समाज के लोगों को समझना होगा और स्त्री के सम्मान एवम् स्वतन्त्रता के लिए प्रयास करने होंगे। इसके लिए किसी अन्य को दोष देना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि बाहरी स्वतन्त्रता से जरूरी है भीतरी स्वतन्त्रता। नूर जहीर ने श्रोताओं द्वारा मुस्लिम मुद्दों जैसे तीन तलाक एवम् बुर्का से सम्बधित सवालों के जवाब भी प्रगतिशील सोच के साथ दिए।

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