जजों के पत्रों का जवाब मिलता तो नहीं होता चार जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस का विवाद : जस्टिस दवे

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जयपुर। समानांतर साहित्य उत्सव के समापन दिवस पर ‘बिज्जी की बैठक’ मंच पर न्यायमूर्ति विनोद शंकर दवे की आत्मकथा पर आधारित हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘एक अदालत अंतर्मन में’ चर्चा का आयोजन रखा गया। जस्टिस दवे से पूर्व महाधिवक्ता गिरधारी बापना और शायर लोकेश कुमार सिंह साहिल ने संवाद किया।
जस्टिस दवे ने अपनी आत्मकथा के कई अनछुए पहलुओं पर चर्चा की एवं न्यायपालिका तथा न्यायिक फैसलों को लेकर श्रोताओं के सवालों का भी जवाब दिया। जस्टिस दवे ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायधीशों की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर हुए विवाद पर बताया कि अगर समय रहते चीफ जस्टिस मिश्रा इन जजों के पत्र का जवाब दे देते तो शायद इस प्रेस कॉन्फ्रेंस की जरूरत ही नहीं पड़ती। इससे न्यायपालिका की साख पर जो हुआ उसकी नौबत नहीं आती और इतना बड़ा विवाद खड़ा नहीं होता।
जस्टिस दवे ने कहा कि भारत ऐसा देश है जहां न्याय हमेशा विलंब से प्राप्त होता है और इसके पीछे ब्रिटिश अदालतों की अवधारणा रही है। भारत अभी भी इससे मुक्त नहीं हो पाया है। उन्होंने मजिठिया आयोग के प्रश्न पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। ज्यूडिशरी में परिवारवाद के प्रश्न का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि मै इसके बिल्कुल विरुद्ध हूं, लेकिन अगर परिवार में कोई सक्षम है तो इसमें कोई बुराई नहीं है। ज्यूडिशरी में राजनीतिक हस्तक्षेप पर उन्होंने कहा कि जब कॉलेजियम नहीं तब जजों की नियुक्ति चीफ जस्टिस की अनुशंसा पर करते थे जो अब नहीं। पूर्व एडवोकेट जनरल बापना ने जस्टिस दवे को एक संवेदनशील जज बताते हुए कहा कि उनके कोर्ट में जब भी फैसला किया गया उससे दोनों पक्ष हमेशा खुश होकर निकलते थे। किसी को भी किसी शिकायत का मौका नहीं देते थे। उनकी छवि एक पारदर्शी न्यायाधीश की रही है। लोकेश कुमार सिंह साहिल ने जस्टिस दवे से कई सवाल उनके व्यक्तिगत जीवन की घटनाओं और फैसलों पर किए जिनका उन्होंने बेबाकी और बड़ी खूबसूरती से जवाब दिया। विशेषकर उन्होंने अपनी महिला सखी के बारे में बेबाक जवाब दिया, जिसका जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा में भी किया है।

उर्दू का भविष्य सुनहरा है

‘बिज्जी की बैठक’ मंच पर अंतिम दिन उर्दू के भविष्य को लेकर एक सत्र का आयोजन किया गया जिसमें हबीब कैफी, लोकेश कुमार सिंह साहिल, एआर नियाजी, बकुल देव और आदिल रजा मंसूरी ने चर्चा की।
प्रमुख शायर और अफसाना निगार हबीब कैफी ने कहा कि उर्दू का मुस्तकबिल इस बात से पता चलता है कि हमारे समय में कितनी महत्वपूर्ण उर्दू पत्रिकाएं निकल रही है जो उर्दू के विकास में मील का पत्थर साबित हो रही है। इनमें से एक पत्रिका इस्तिकसार भी है। उन्होंने कहा कि जबान हर जमाने में बदलती रही है और बदलती रहेगी।
प्रमुख शायर लोकेश कुमार सिंह साहिल ने कहा कि भाषा के लिए लिपि बहुत जरूरी है। बिना लिपि के जबान नहीं पनप सकती। उन्होंने कहा कि बहुत से लोग लिपि को नहीं जानते लेकिन उर्दू में बोल रहे है और उसे समझ रहे हैं, प्यार कर रहे हैं। उर्दू जबान कभी खत्म नहीं हो सकती।
एआर नियाजी ने कहा कि जब तक मां जिंदा है जबान मर नहीं सकती। उर्दू किसी मजहब की भाषा नहीं बल्कि यह हिंदुस्तान की भाषा है। युवा शायर बकुल देव ने कहा कि बोली को भाषा बनने के लिए लिपि की जरूरत होती है।
आदिल रजा मंसूरी का संचालन करते हुए कहा कि उर्दू रोजगार की भाषा बननी चाहिए और नए नए लोग इसे जुड़ रहे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि उर्दू लोगों के दिलों में जगह बना रही है। उन्होंने कहा कि संस्कृत से प्राकृत से खड़ी बोली से होते हुए उर्दू का सफर तय हुआ। इसकी लिपि को जिंदा रखना, इस भाषा को जिंदा रखना है।

संपादक की सुघराई

उत्सव के तीसरे दिन ‘बिज्जी की बैठक’ में आयोजित सत्र ’संपादक की सुघराई’ में अक्सर पत्रिका के संपादक डॉ. हेतु भारद्वाज, ’हथाई’ राजस्थानी पत्रिका के संपादक भरत ओला, वरिष्ठ पत्रकार अनिल यादव, ’पाखी’ के संपादक प्रेम भारद्वाज एवम् बया पत्रिका के संपादक गौरीनाथ जैसे विद्वानों ने भाग लिया।
डॉ. हेतु भारद्वाज ने कहा कि लघु-पत्रिकाओं का प्रभाव भी बहुत दूरगामी होता है क्योंकि ये साहित्य साधना के जरिए जनभावनाओं चित्रण करती है। संपादकों को धैर्य के साथ काम करना चाहिए और किसी भी धमकी से डरे बिना अपने संपादकीय कार्य को निष्पक्ष भाव से करना चाहिए।
प्रेम भारद्वाज ने कहा कि आज के दौर में जब ’एक देश, एक भाषा’ पर थोपा हुआ कार्य बढ़ रहा है ऐसी स्थिति में अपनी मातृभाषा को बचाये रखने के लिए लघु पत्रिका संपादको की हिम्मत व योगदान को कमतर नही आँका जा सकता।
गौरीनाथ ने माना कि संपादन कार्य कई बार बजट के अभाव में ’’घर फूँक-तमाशा देखने’ जैसी हालात पैदा करता है लेकिन लोक-संस्कृति को बचाने के लिए यह प्रयास भी अडिग रहे तो एक निश्चित समय के बाद पत्रिका की साख व आमदनी दोनों बढ़ने लगते है।
राजस्थानी भाषा की पत्रिका ’हथाई’ के संपादक भरत ओला ने कहा कि वर्तमान में लघु भाषाओं की पत्रिकाएँ न केवल अर्थ-संकट बल्कि राजनीतिक दबाव व सुधी-पाठकों की समस्या से भी जूझती रहती है। ऐसे संपादक स्वयं ही प्रूफ रीडिंग, डाकियागिरी, लेखन आदि सभी कार्य करने के बावजूद भी संघर्षरत है।
मंच संचालन कर रहे अनिल यादव ने आजकल लेखकों द्वारा कचरा रचनाएँ छपवाने के लिए दिये जा रहे धन प्रलोभन की ओर भी इशारा किया।

सिनेमा और पॉलटिक्स पर हुए तीखे कटाक्ष

समानांतर साहित्य उत्सव के समापन दिवस की देर शाम ‘‘सिनेमा और पॉलटिक्स’’ पर प्रख्यात कवि विष्णु खरे और प्रलेस के प्रदेश महासचिव एवं वरिष्ठ पत्रकार ईशमधु तलवार ने अपने बेबाक विचार रखे। विष्णु खरे ने कहा कि साहित्य की अपेक्षा सिनेमा अधिक सशक्त माध्यम है लोगों तक जनजागृति लाने और कुविचारों से बचाव करने का। उन्होंने उत्सव के मुख्य समन्वयक ईशमधु तलवार से मंच के माध्यम से आग्रह करते हुए कहा कि अगले साहित्य उत्सव में सिनेमा पर एक सेशन नहीं बल्कि एक पूरा दिन रखें। खरे ने कहा कि वर्तमान युग में फिल्म बनाना अधिक आसान हो गया है क्योंकि कैमरे न्यूनतम दर में भी उपलब्ध है। यू ट्यूब पर भी आप अपनी फिल्म बनाकर अपनी क्रिएटिविटी बता सकते हैं, अपनी बात पहुंचा सकते हैं। उन्होंने विवादित फिल्म पद्मावती पर हुए हंगामे पर संजय लीला भंसाली और वर्तमान सरकार की कार्यशैली पर तीखे प्रहार करते हुए इसे गलत बताया। उन्होंने कहा कि विगत तीनों वर्षोे में जितना मतभेद फैला है उतना आज तक देखने को नहीं मिला। राजनीति का यह बुरा दौर है। लोगों ने उनसे प्रश्न भी पूछे जिनका उन्होंने सहज भाव से जवाब दिया। ईशमधु तलवार ने वर्तमान सिनेमा और राजनीति पर अपने विचार रखे।

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