समानान्तर साहित्य उत्सव: भारतीय भाषाओं और लेखकों को मिली ऊर्जा

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जयपुर। राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से साहित्य के कॉरपोरेटीकरण तथा बाजारीकरण के विरुद्ध सवाई मानसिंह स्टेडियम के नजदीक यूथ हाॅस्टल में आयोजित तीन दिवसीय समानान्तर साहित्य उत्सव ने भारतीय भाषाओं और उसके लेखकों में ऊर्जा का संचार कर दिया। हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के साथ ही संस्कृति से साहित्यप्रेमियों को रूबरू कराने की इस पहल ने अपना परचम प्रथम आयोजन में ही फहरा दिया। तीन दिन के इस आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि इसमें बड़ी संख्या में वो श्रोता शामिल हुए जिन्हें वास्तव में साहित्य और भारतीय भाषाओं से सरोकार था।

मुक्तिबोध मंच: आज भी बुरे दिनों में है गद्य

समानान्तर साहित्य उत्सव के अंतिम दिन मुक्तिबोध मंच पर ‘‘गद्य बुरे दिनों में’’ सत्र के दौरान जितेन्द्र भाटिया, सत्यनारायण, नूर जहीर और अनिल यादव जैसे कहानीकारों ने कहानी पाठ के साथ अपने विचार प्रकट किये। मंच का संचालन भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित उपन्यास ‘‘जन्नत जांविदा’’ की लेखिका उमा ने किया।
शुरुआत में ‘’गद्य बुरे दिनों में’’ पर बोलते हुए जितेन्द्र भाटिया ने कहा कि गद्य का प्रभाव भारत- पाकिस्तान की संस्कृति के वास्तविक रूप को प्रकट करता रहा है। कराची या लाहौर शहर की संस्कृति, खान-पान, रहन-सहन, सिनेमा, चाट-पकौड़े आदि जो गद्य में हमें कहानियों या उपन्यासों में दिखाई पड़ता है वही साहित्य मुम्बई शहर के चित्रण को भी समान रूप से स्पष्ट करता है।

डॉ. सत्यनारायण ने अपने रिपोर्ताज या शब्द-चित्र ’वह केसर क्यारी’ के माध्यम से धौलपुर जैसे डांग क्षेत्र में महिलाओं की बदतर जिन्दगी का चित्रण करते हुए बताया कि कैसे आज भी केसर जैसी सुन्दर महिलाएं डांग क्षेत्रों में बन्दूक की नोक पर रखैल बना दी जाती हैं और उन्हें जगह-जगह बेच दिया जाता है।
नूर जहीर ने अपने आगामी उपन्यास ’फसानावाद’ पर चर्चा करते हुए कहा कि बंटवारे के दौरान मुस्लिम महिलाओं से नहीं पूछा गया था कि उन्हें भारत या पाकिस्तान किस मुल्क में रहना पसन्द है? उन्होंने ’कहानी कैसे चले’ के माध्यम से फिरोजाबाई का चित्रण करते हुए बताया कि कैसे एक महिला को फिल्म अभिनय के क्षेत्र में संर्घष करना पड़ता है।
अनिल यादव ने अपने आगामी उपन्यास से ’प्रेमी का अधेड़ प्रेमिका को पत्र’ के माध्यम से हिन्दी लेखकों की पीड़ा को व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान में हिन्दी लेखक को अपने सपनों को पूरा करने के लिए मामूली संसाधन भी उपलब्ध कर पाना मुश्किल हो रहा है। सत्र समापन पर उमा ने सभी कहानीकारों का आभार व्यक्त किया।

राजनीति की भाषा पतन की ओर अग्रसर

मुक्तिबोध मंच पर ही ‘‘राजनीति की भाषा का पतन’’ सत्र का आयोजन किया गया जिसमें वरिष्ठ कथाकार एवं प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव राजेंद्र राजन, दीपक मल्लिक, प्रो. नरेश दाधीच और पूर्व सांसद सरला माहेश्वरी की भागीदारी रही। कार्यक्रम का संचालन बीबीसी संवाददाता नारायण बारेठ ने किया। वक्ताओं का मत था कि राजनीति की भाषा में निरंतर गिरावट आई है और यह पतन की ओर अग्रसर है। आजादी के बाद राजनीतिक मूल्यों के पतन साथ भाषा का पतन भी हुआ है।

वरिष्ठ कथाकार राजेंद्र राजन ने कहा कि राजनीति की आलोचना करो और अपने को पवित्र बनाओ। राजनीति हमारे जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। हमारा जीवन राजनीति से अलग नहीं है। वाल्मिकी हमारे आदि कवि है जिन्होंने हमें प्रेम और सद्भाव की भाषा दी। हमारे कवि भक्तिकाल में आम आदमी के लिए लिख रहे थे। इसी कारण प्रतिपक्ष बन पाया। हमारे कवि चाहे वाल्मिकी हो या कबीर सभी सत्ता को चुनौती देते है। इसी कारण वह महान बन पाए। संत साहित्य ने भाषा में विद्रोह पैदा किया। आजादी के आंदोलन में हिंदी को माध्यम बनाया गया। आज की राजनीति में मूल्य के नाम पर प्रश्न चिन्ह खड़ा है। नेताओं के जीवन में मूल्य खत्म हो गए है और इसलिए भाषा खत्म हो रही है। उन्होने कहा कि अगर भाषा जनता के साथ नहीं जुड़ी तब तक भाषा की यही दशा रहेगी।
पूर्व सांसद एवं मार्क्सवादी विचारक सरला माहेश्वरी ने कहा कि भाषा की गिरावट का मामला जीवन की संपूर्ण गिरावट का मामला है। आज का लोकतंत्र चुप्पी और डर का बन गया है। बाजार और नियामक निर्णायक बनता जा रहा है। शक्ति ही सर्वाच्च है। भाषा विचारों को भ्रष्ट करती है तो विचार भी भाषा को भ्रष्ट करते हैं। उन्होंने जॉर्ज ऑरवेल का कथन उदृत किया कि- शब्द नहीं करते खुदकुशी। हिटलर के जमाने में मनुष्य शक्ति की तानाशाही का शिकार होता रहा है।
प्रो. नरेश दाधीच ने कहा कि राजनीति की भाषा बहुत बदल गई है। भाषा के पतन का कारण सामाजिक जीवन की बदलती धारा भी है।
दीपक मल्लिक ने कहा कि भाषा कब उभरी और कब उसमें गिरावट आई। भाषा का गिरना विमर्श का भी गिरना है। आजादी की लड़ाई ने नए शब्दों को जन्म दिया जो सबसे अहम रहा है। नेहरू युग की अपनी भाषा थी, वह खास तरह का समाजवाद था। वामपंथ के दबाव से भाषा के नए युग का निर्माण हुआ। सियासत की भाषा आंदोलनों से रची जाती है। राजनीति की सम्मान जनक भाषा समाप्त हो रही है। भाषा पर राजनीति में आज के प्रधानमंत्री के बारे में क्या कहा जाए? उनकी भाषा से क्या उम्मीद की जाए?। उन्होंने कहा कि आज जन आंदोलन बहुत सीमित हो गए हैं। 2014 में दक्षिण पंथी विमर्श नस्ली विमर्श में बदलता दिखाई दिया। भाषा के बिखरने का कोई ढ़ांचा नहीं है, इसी कारण भाषा लगातार निकल रही है। वर्ष 2014 के बाद हमारी पुरानी भाषा सरस्वती नदी की तरह विलुप्त हो गई है।

किसान गाथा सत्र : कविता से क्रान्ति आई

मुक्तिबोध मंच में ‘‘किसान गाथा’’ पर भी एक सत्र आयोजित किया गया इस सत्र में प्रो. बृजकिशोर शर्मा ने भूमि बन्दोस्त तथा संथाल विद्रोह के द्वारा किसानों तथा आदिवासियों की स्थिति का चित्रण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि कविता से क्रान्ति आई है। समाज में परिवर्तन लाने में कविता प्रमुख शस्त्र के रूप में काम ली जा सकती है। किसानों के विकास का रास्ता खेत और खलिहानों से होता है। लेखक राघव प्रकाश ने कार्यक्रम का संचालन किया।
इस सत्र में तारासिंह सिद्धू ने कहा कि लेखकों को गंभीर रहना है तो समाज से परिचित होना होगा। उन्होंने लेखन के द्वारा समाज को विकसित करने की बात भी कही। उन्होंने कहा कि उद्योगपति पैसे से हर बात तोलते है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि वास्तविकता यह है कि आज अन्न दाता को ही भूखा रहना पड़ता है।
राजाराम भादू ने कहा कि पूंजीपतियों के सामने किसान अपनी उपज का मोल नही लगा सकता। उसके लिए भी उन्हें पूंजीपतियों की मनमानी सहनी पड़ती है। उन्होंने किसानों की दयनीय तथा वास्तविक स्थिति की मार्मिक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए बताया कि किस तरह से किसान अपनी जमीन पर अनाज उगाता है। उसके बाद भी कैसे उसे निम्न माना जाता है।

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