भविष्य में वट वृक्ष की तरह स्थापित होगा ‘‘समानान्तर साहित्य उत्सव’’

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राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से अंग्रेजी साहित्य के बढ़ते वर्चस्व को देखते हुए कॉरपोरेटीकरण तथा बाजारीकरण के विरुद्ध जयपुर में सवाई मानसिंह स्टेडियम के नजदीक यूथ हाॅस्टल में आयोजित किया गया प्रथम त्रिदिवसीय ‘समानान्तर साहित्य उत्सव’ कई मायनों में सफलता के साथ अपनी एक अलग पहचान स्थापित करने में कामयाब रहा। इतने बड़े और व्यापक स्तर पर आयोजित इस आयोजन में हालांकि कुछ छोटी-छोटी कमियां भी नजर आईं, लेकिन आयोजकों के उत्साह और आयोजन को सफल बनाने को लेकर उनकी कटिबद्धता व समर्पण को देखते हुए उन कमियों को इस सोच के साथ नजरअंदाज किया जा सकता है कि पहला आयोजन है, अगले आयोजन में इन खामियों को दूर कर दिया जाएगा। निःसंदेह इस आयोजन के लिए वरिष्ठ पत्रकार एवं प्रलेस के महासचिव ईशमधु तलवार और उनकी टीम साधुवाद की पात्र है।


जब इस आयोजन की घोषणा की गई, तब अनेक लोगों के मन में संशय था कि इतना बड़ा और व्यापक उत्सव कैसे होगा, और वो भी तीन दिन तक, लेकिन सभी संशय निर्मूल साबित हुए और ‘‘समानान्तर साहित्य उत्सव’’ के सफल आयोजन ने हिन्दी और देश की अन्य भाषाओं के साथ ही उर्दू के रचनाकारों के लिए भी सफलता के नए सोपान अर्जित करने के द्वार खोल दिए। जिस प्रकार तीन दिवसीय आयोजन से साहित्य प्रेमियों का जुड़ाव नजर आया उसने इस आयोजन को भविष्य में वट वृक्ष की तरह स्थापित होने के संकेत अभी से दे दिए हैं।


समानान्तर साहित्य उत्सव के दौरान जहां साहित्य के पुरोधाओं ने अनेक विषयों पर सार्थक चर्चा की, वहीं राजस्थानी, सिंधी और उर्दू भाषा के साथ ही दलित एवं आदिवासी और स्त्री विमर्श पर भी खुलकर विद्वानों के स्वर मुखर हुए। राजनीति भी इस उत्सव से अछूती नहीं रही। उस पर भी विष्णु खरे जैसे नामचीन हस्ताक्षर ने खुलकर बोला। सिनेमा, नाटक और सांस्कृतिक विषयों पर हुई प्रस्तुतियों ने इस उत्सव में चार चांद लगा दिए। अहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन की लाइव प्रस्तुति और भपंग वादक स्व. जहूर खां के पोते यूसुफ खां एण्ड पार्टी की लाइव प्रस्तुति ने इस आयोजन के बहुआयामी रंगों को नई बुलंदियों तक पहुंचाने का काम किया। देखा जाए तो समानान्तर साहित्य उत्सव के माध्यम से आयोजकों ने हिंदी, उर्दू, पंजाबी, राजस्थानी और अन्य भारतीय भाषाओं में हो रहे विष्व स्तरीय लेखन को रेखांकित करने का जो बीड़ा उठाया, उसमें वे काफी हद तक सफल रहे।

त्रिदिवसीय इस उत्सव में करीब 24 सत्र आयोजित किये गए, जिसमें कविता, कहानी, आलोचना, राजनीति, अर्थशास्त्र, किसान, दलित, आदिवासी-बहुजन आदि विषयों पर हिंदी, उर्दू, पंजाबी, राजस्थानी, सिंधी आदि भाषाओं में विस्तृत चर्चा हुई। उत्सव के दौरान हर शाम नाटक, कविता पाठ, संगीत का आयोजन भी हुआ। सबसे महत्वपूर्ण यह रहा कि इस उत्सव में राजस्थान की लोककलाओं और लोक संगीत को भी पूरी तव्वजो दी गई। विष्णु खरे, नरेश सक्सेना, मैत्रेयी पुष्पा, अर्जुन देव चारण, राजेन्द्र राजन, लीलाधर मंडलोई, प्रेम भारद्वाज, कात्यायनी, हरिराम मीणा, नूर जहीर, रति सक्सेना, जितेन्द्र भाटिया, रणवीर सिंह, नारायण बारेठ, त्रिभुवन जैसे विद्वानों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा जहां इस आयोजन को एक नई ऊर्जा से परिपूर्ण किया, वहीं दुर्गाप्रसाद अग्रवाल, चरणसिंह पथिक, विनोद भारद्वाज, सत्यनारायण, लोकेश कुमार सिंह साहिल, प्रेमचंद गांधी, राजाराम भादू, कैलाश मनहर, भगवान अटलानी, अनिल यादव, उदय शंकर, गजेंद्र श्रोतिय, रामकुमार सिंह, भरत ओला, परमानंद पांडे, प्रीता भार्गव, मीठेश निर्मोही, श्याम जांगिड़, उमा, तस्नीम खान, अजय अनुरागी, अशोक राही, बकुल देव जैसे साहित्यकारों की उपस्थिति ने इसे जीवंत बना दिया।
उत्सव के दौरान ‘कविता बुरे दिनों मे’, ‘जंगल के दावेदार’, ‘बाजार के शोर में साहित्य’, ‘स्त्री लेखन’, ‘नौटंकी का नेपथ्य’, प्रतिरोध की हिंदी कविता’, ‘कहानी बुरे दिनों में’, ‘राजस्थानी साहित्य में दलित आहट’, ‘सिनेमा और भारतीय गांव’, ‘फिल्मी गीतों के सामाजिक सरोकार’ जैसे अनेक सत्रों ने समानान्तर साहित्य उत्सव को सफलता की ऊंचाईयों पर पहुंचा दिया। साथ ही इरशाद कामिल, ए.आर. नियाजी, अविनाश दास, हेतु भारद्वाज की मौजूदगी ने इस आयोजन को एक अलग पहचान स्थापित करने का अवसर प्रदान किया। प्रलेस के अध्यक्ष ऋतुराज और कृष्ण कल्पित के साथ ही श्रमजीवी पत्रकार संघ के अध्यक्ष हरीश गुप्ता की भूमिका नेपथ्य में रहते हुए भी सराहनीय थी। त्रिदिवसीय आयोजन के दौरान मीडिया प्रकोष्ठ की जिम्मेदारी जिस उत्साह और सजगता के साथ फारूक आफरीदी और उनकी टीम ने निभाई, उसे भी किसी भी तरह से कमतर नहीं आंका जा सकता है।


इस आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि ये रही कि आयोजकों ने इसे पूरी तरह से हिंदी साहित्य के पुरोधाओं को समर्पित कर दिया। आयोजन स्थल परिसर को हिन्दी के प्रथम कथाकार चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ के नाम पर ’गुलेरी-ग्राम’ दिया गया। उपन्यास-सम्राट मुंशी प्रेमचंद के नाम पर ’प्रेमचन्द-द्वार’ और राजस्थान के समाजवादी कवि नन्द चतुर्वेदी के नाम पर प्रवेश द्वार स्थापित किये। हिन्दी कवि गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ के नाम पर ’मुक्तिबोध-मंच’ और राजस्थान के प्रख्यात कथाकार विजयदान देथा के नाम पर ’बिज्जी की बैठक’ का निर्माण किया। अतिथि लेखकों की रचना पाठ के लिए जनकवि हरीश भादानी के नाम पर परिसर में एक ’’नुक्कड़’’ का निर्माण किया तो विख्यात चित्रकार रामगोपाल विजयवर्गीय के नाम से उत्सव परिसर में एक कला दीर्घा बनाई। गोडावण और कुरजां मंच को साहित्यप्रेमियों से लेखकों को मिलने और संवाद करने के लिए स्थापित किया गया।
देखा जाए तो अनेक विरोधाभासों के बीच शुरू किये गए ‘समानान्तर साहित्य उत्सव’ के पहले आयोजन की सफलता ने इस बात का इशारा कर दिया है कि आने वाले भविष्य में यह आयोजन कॉरपोरेटीकरण तथा बाजारीकरण के नाम पर साहित्य को अलग दिशा में ले जा रहे आयोजनों पर भारी पड़ने वाला है।

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