खुली बहस: समुदाय विशेष में मासूम बच्चियों का खतना कितना जायज

(निशांत मिश्रा/मीडिया चक्र)
समुदाय विशेष में धार्मिक कारणों से पांच साल से कम उम्र की मासूम बच्चियों का खतना (फीमेल जेनिटल म्यूटलेशन) किये जाने की परंपरा आज के संदर्भ में कितनी जायज है, यह एक बड़ा गंभीर और विचारणीय सवाल है। भारत में ही नहीं विश्व के अनेक देशों में इस परंपरा को लंबे अरसे से निभाया जा रहा है, लेकिन इस गुनाह को धार्मिकता का जामा पहना कर समुदाय विशेष ने मानवाधिकार संगठनों और सामाजिक सरोकार की पैरवी करने वालों की सोच व मुंह पर ताला जड़ रखा है। हालांकि अब हमारे देश में इस परंपरा के खिलाफ आवाज मुखर होने लगी है। सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर खतना प्रथा के खिलाफ सुनवाई करने का फैसला लिया है।
धर्म और परंपरा के नाम पर पांच साल से कम उम्र की मासूम बच्चियों को, जिन्हें ना तो धर्म का ज्ञान होता, ना ही परंपरा का बोध, खतना जैसी अमानवीय पीड़ा से बिना सहमति व इच्छा के गुजरना पड़ता है। धर्म या परंपरा के नाम पर ऐसी अबोध बालिकाओं पर खतना की पीड़ा थोपना किसी भी समाज में जायज कैसे ठहराया जा सकता है? देखा जाए तो यह परंपरा खतना की पीड़ा से गुजरने वाली बच्चियों के लिए अभिशाप है। संयुक्त राष्ट्र के बाल कोष यूनीसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्वभर में कम से कम 20 करोड़ ऐसी बच्चियां और महिलाएं हैं जिनका खतना किया गया है। इनमें से आधी लड़कियां और महिलाएं मिस्र, इथोपिया और इंडोनेशिया में रह रही हैं। जिन 20 करोड़ बच्चियों और महिलाओं का खतना कराया गया है उनमें से करीब चार करोड़ 40 लाख बालिकाओं की उम्र 14 वर्ष या उससे भी कम है।
यूनीसेफ ने अपनी रिपोर्ट में इस प्रथा को बाल अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन करार देते हुए लिखा है कि जिन 30 देशों में यह प्रथा सर्वाधिक फैली हुई है वहां अधिकतर लड़कियों का खतना उनके पांचवें जन्मदिन से पूर्व ही करा दिया जाता है। अफ्रीकी देशों के कबायली समुदायों में प्रचलित खतना का यह रिवाज भारत में भी बड़े स्तर पर अपने पांव पसार चुका है। मिस्र, केन्या, यूगांडा जैसे देशों में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। खतना परंपरा किसी सजा से कम नहीं है। खतना के बाद बच्चियां कईं महीनों तक असहनीय दर्द से जूझती रहती हैं और कई बच्चियों की तो संक्रमण फैलने के कारण मौत भी हो जाती है।
फीमेल जेनाइटल म्यूटिलेशन यानी खतना में छोटी बच्चियों के गुप्तांग (क्लिटोरिस) पर मुल्तानी मिट्टी लगाकर वह हिस्सा बिना सुन्न किये काट दिया जाता है। यह बहुत ही भयावह प्रक्रिया होती है। इसमें औरतें छोटी बच्चियों के हाथ-पैर पकड़ लेती है और फिर क्लिटोरिस को काट दिया जाता है। समुदाय विशेष में में मान्यता है कि खतना से औरतों का मासिक धर्म और प्रसव पीड़ा कम होती है। कहा जाता है कि खतना के कारण शादी के बाद पति से सेक्स संबंध बनाने में लड़की की रूचि लगभग खत्म हो जाती है। सहवास के दौरान उसे बहुत तकलीफ होती है जिस वजह से उसे इसमें कोई आनंद नहीं आता है।
भारत में इस परंपरा को चुनौती देने वाली एक याचिका पर पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जे.एस. खेहर की अध्यक्षता वाली बेंच ने केंद्र सरकार, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया है। कानूनी प्रक्रिया अपनी जगह है और उसके बाद जो फैसला आएगा वो भी महत्वपूर्ण होगा, लेकिन मानवीय दृष्टिकोण से आज के सभ्य समाज में धर्म और परंपरा के नाम पर चल रही इस बर्बर और अमानवीय प्रथा को देखकर मूक बने रहना किसी भी मायने में सही नहीं ठहराया जा सकता है।
खतना प्रथा शर्मनाक, इसके खिलाफ मुहिम चले: निशात हुसैन
मुस्लिम समाज में प्रचलित ट्रिपल तलाक, निकाह हलाला जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर मुखर रहने वाली नेशनल मुस्लिम वीमेंस वेलफेयर सोसायटी की अध्यक्ष निशात हुसैन ने खतना प्रथा को बहुत ही सेंसेटिव मुद्दा बताते हुए कहा है कि जिस प्रकार हमने ट्रिपल तलाक के मुद्दे को उठाया है उसी प्रकार इसे उठाना भी उतना ही जरूरी है। यह प्रक्रिया आजकल से नहीं लंबे समय से चल रही है। खतना प्रथा इतनी शर्मनाक है कि अगर टोटल हम देखते हैं तो यह औरतों से सेक्सुअल रिलेटिव हैं। खतना के नाम पर जिस तरह औरत के जिस्म के पीसों को काट दिया जाता है उसका टोटल मतलब यह है कि वो सेक्स डिमांड ना करे, सेक्स में इंटरेस्ट ना ले और सेक्स को लेकर कभी सोचे ही नहीं। इसको लेकर इनका सिर्फ यही एक मकसद है।
खतना को हिंसा करार देते हुए उन्होंने कहा कि यह इतनी बारीक हिंसा है कि इसको लेकर कोई सोच भी नहीं सकता है। औरत की पूरी लाइफ डिस्टर्ब होती है इस हिंसा से। उन्होंने कहा कि हम खतना प्रथा की घोर निंदा करते हैं। जिस तरह से ट्रिपल तलाक को लेकर एक मुहिम चली, उसी तरह तुरंत प्रभाव से इस मुद्दे पर भी मुहिम चलनी चाहिए। हम लोग भी इस मुहिम में शामिल होंगे। कितनी तकलीफ होती है बच्ची को और जिंदगीभर उसे इसकी पीड़ा झेलनी पड़ती है।

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